कम्पवात या नर्तन रोग का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Chorea, Parkinsonism ]

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इसमें मस्तिष्क पर रोग का आक्रमण होता है। किसी-किसी का कथन है। कि इसमें मस्तिष्क और मेरुमज्जा दोनों ही पर रोग का आक्रमण होता है। जो हो, इस रोग में नर्वस सिस्टम (स्नायु-मंडल) की क्रिया नष्ट हो जाती है, इसमें संदेह वाली कोई बात नहीं है। इस रोग में शरीर के किसी भी अंग का फड़कना ही मुख्य है। प्रायः अपना भोगकाल समाप्त कर यह रोग अपने आप ही शांत हो जाती है। भय, अवसाद, हस्तमैथुन की अधिकता, कृमि आदि के कारण इस रोग की उत्पत्ति हो जाती है।

एगरिकस 30, 200 — यह नर्तन या तांडव रोग (कोरिया) की मुख्य औषधि है। इसके लक्षण हैं मस्तिष्क और वातरज्जु (ब्रेन एंड स्पाइनल काड) में रक्तहीनता हो जाती है, शरीर की एक या अधिक पेशियां स्पंदित होती हैं, कभी-कभी दाहिने हाथ और बाएं पैर की पेशियां स्पंदित होती हैं। इस तरह पेशियों का कभी एक अंश में, कभी समूचे शरीर में, कभी कम और कभी अधिक स्पंदन होता है, सो जाने से स्पंदन घट जाता है, पर एक तरह का झटका या खिंचाव बढ़ जाता है। इन लक्षणों के साथ आंख या पलकों का फड़कना, कलेजा धड़कना, शब्द-विहीन अत्यधिक वायु निकलना इत्यादि में यह उपयोगी औषधि है।

कूप्रम मेट 6, 30 — अकड़न की तरह पेशियों का प्रबल स्पंदन होना, स्पैज्म (आक्षेप) हाथ-पैर की उंगलियों से होना, सो जाने पर कुछ कम होता है, पर नींद में भी कुछ न कुछ रहता है। गले की पेशी पर रोग का हमला, जिससे निगलने और श्वास लेने में कष्ट होता है, पाकस्थली में मरोड़ होना, उससे वमन होना, पैर की पिंडलियों में ऐंठन होना।।

हायोसियामस 30 — शरीर की हरेक पेशी में स्पंदन और झटका देकर खींचन की तरह दर्द होना, जोर-जोर से हाथ पटकना। स्त्रियों को गर्भावस्था में यदि नर्तन-रोग हो जाए, तो रोगी स्त्री सोते-सोते स्वप्न में डरकर जाग पड़ती है; उसे डरावनी चीजें और काल्पनिक मूर्तियां दिख पड़ती हैं।

सिमिसिफ्यूगा 200 — गर्भावस्था में नर्तन-रोग तथा डर जाने के कारण रोग की उत्पत्ति होती है। रोगी का मन बहुत खराब रहना, नींद न आना, बाएं अंग के आधे भाग में रोग का होना।

जेलसिमियम 3 — इस औषधि का प्रभाव स्नायु-संस्थान पर पड़ता है। इस औषधि के सूचक लक्षण हैं कंपन, सिर चकराना, ऊंघना और सुस्ती। आतंक, भय तथा अशुभ समाचार से इस औषधि के रोग हो जाया करते हैं, इसलिए इन कारणों से यह रोग हो, तो यह औषधि उपयोगी है। यदि इस औषधि का टिंक्चर प्रयोग किया जाए, तो अवश्य लाभ होता है।

इग्नेशिया 200 — यह औषधि भी जेलसिमियम की तरह आतंक, धमकी, दंड या अशुभ समाचार अथवा मानसिक-कष्ट से उत्पन्न होने वाले कंपन के रोग में अत्यंत उपयोगी है। रोगी आहें भरा करता है। नर्तन-रोग में यह अवश्य दी जानी चाहिए।

नक्सवोमिका 30 — रोगी डगमगाता चलता है। उसके रोग का केंद्र स्पाइनल कॉर्ड होती है। रोगी पांव घसीटता-सा चलता है। कब्ज की शिकायत भी साथ होती है।

टैरेंटुला हिस्पैनिया 6 — रोगी चल नहीं पाता है, लेकिन भागता बहुत अच्छा है। वह रात को ऊंघते हुए और उबासियां लेते हुए भी टांगे स्थिर नहीं रख सकता।

जिंकम मेटैलिकम 30 — शरीर में सोते हुए भी कंपन रहता है, जागते हुए भी रहता है और खड़े होने और चलते हुए भी। यह औषधि कंपन में विशेष लाभ करती है।

कॉस्टिकम 6 — कोरिया रोग में इस औषधि का बहुत प्रमुख स्थान है। डॉ. ज्हार इस रोग का उपचार पहले इग्नेशिया से करते थे और उससे लाभ न होने पर ही कॉस्टिकम देते थे, जिससे अवश्य ही लाभ होता था। यदि किसी भी औषधि से लाभ होता न दिखता था, तो सल्फर और कैल्केरिया कार्ब से रोग का शमन कर देते थे।

बहुत अधिक रक्त-संचय, हृदय की क्रिया में गड़बड़ी हो तो वेरेट्म विरिड; बहुत अधिक रक्तहीनता, बहुत कमजोरी, हृदय की तेज क्रिया, अस्थिरता इत्यादि लक्षण में आर्सेनिक; पेशियों में बहुत ज्यादा कमजोरी हो तो जेलसिमियम; पक्षाघात जैसी अवस्था, स्वरभंग, जुबान लड़खड़ाना, मूत्राशय की कमजोरी में कॉस्टिकम; अंग-प्रत्यंग में बहुत अधिक स्पंदन और मेरुमज्जा की उत्तेजना में टैरेण्टुला देनी चाहिए।

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