हृदय प्रसारण या हृदय वृद्धि का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Dilatation and Hypertrophy of The Heart ]

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इस रोग के मुख्य दो कारण हैं-(1) हृदय (हत्पिण्ड) के एक प्रकोष्ठ (चेम्बर) में जाने के मार्ग में जो वाल्व (कपाट) है, यदि किसी रोग के कारण इसका मुंह संकरा हो जाए, तो उस प्रकोष्ट का सब रक्त बाहर नहीं निकल जाता, कुछ अंश भीतर रह जाता है, इससे हार्ट का डाइलेशन (हृत्प्रसाारण) होता है। (2) यदि रोग के कारण से वाल्व पूरी तरह से बंद नहीं होता और रक्त बाहर निकलकर भी फिर उस वाल्व में लौट जाता है, तो भी उस प्रकोष्ठ के भीतर अधिक रक्त रह जाता है; इससे भी हार्ट का डाइलेटेशन (हप्रसारण रोग) होता है। यदि किसी भी कारण से हृदय में रक्त अधिक हुआ रहता है, तो दिनोंदिन थोड़ा-थोड़ा कर हृदय के प्रकोष्ठ बड़े होते जाते है। इसको “डाइलेटेशन ऑफ दी हार्ट” (हृत्प्रसारण रोग) कहते हैं।

डाइलेटेड (प्रसारित) हो जाने पर हृदय की पेशी (Muscle) भीतर का रक्त बाहर निकाल देने के लिए पहले की अपेक्षा और भी जोर से फैलती है और संकुचित होती है तथा अधिक शक्ति लगाने के कारण हृदय की पेशी धीर-धीरे मोटी और बड़ी होती जाती है, इसको “हाइपरट्रॉफी ऑफ दी हार्ट” कहते हैं।

यहां हम यह बता देना चाहते हैं कि हाइपरट्रॉफी ऑफ दी हार्ट से क्या लाभ है? दरअसल वाल्व के पतला पड़ जाने के कारण से हो अथवा ढीला हो जाने के कारण से हो-जब हदय में रक्त अधिक इकट्ठा होता है और हृदय के भीतर रक्त का एक सोता बहा करता है, उस समय हृदय की पेशी स्वयं जोर से संकुचित और प्रसारित कर रक्त को बाहर निकालकर हृदय की इस कमी को पूरा कर देती है। इससे रक्त सर्कुलेशन में अधिक हानि नहीं पहुंचती। किंतु यह पेशी जल्द ही कमजोर हो जाती है और तब शरीर के रक्त के सर्कुलेशन में गड़बड़ी होने लगती है, उसे ही वाल्व का रोग कहते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि जब तक हृदय की वृद्धि रहेगी, तब तक रक्त के सर्कुलेशन में किसी तरह का गड़बड़ी न होगी।

जिन लोगों को बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है, प्राय; उनके हृदय की वृद्धि हुआ करती है। बहुत ज्यादा चाय या कॉफी पीने, अधिक इंद्रिय-परिचालन आदि कारण तथा उपदंश वाले, वात, ऐल्बुमिनुरिया (अंडलाल मिला पेशाब) रोग वाले व्यक्तियों को भी हार्ट की हाइपरट्रॉफी (हृदय-वृद्धि) हुआ करती है। “माइट्रैल वाल्व” के रोग में यदि लेफ्ट ऑरिकल में अधिक रक्त इकट्ठा होकर हार्ट डाइलेटेड (हृदय-प्रसारित) हो जाए, तो इसका परिणाम यह होगा कि पल्मोनरी सर्कुलेशन में बाधा पड़ेगी, पल्मोनरी आर्टरी में रक्त की अधिकता होगी। फेफड़ों में नियमित रूप से रक्त की सफाई ने होगी, पल्मोनरी आर्टरी (फुसफुसिया धमनी) में रक्त की अधिकता के कारण आर्टरी (धमनी) फटकर मुंह से रक्त आएगा, खांसी के साथ रक्त निकलेगा। कष्टकर खांसी और श्वास में कष्ट होगा।

माइट्रैल वाल्व के रोग में हार्ट मसल्स कमजोर हो जाने पर पेट के प्रायः सभी यंत्रों में रक्त अधिक होगा, इसका परिणाम यह होगा कि यकृत खूब बड़ा हो जाता है, आंतों में पित्त के आने-जाने की राह रक्त से भरे यकृत की धमनी के दबाव के कारण कामला रोग हो जाता है और आंतों में पित्त नियमित भाव से प्रवेश न कर सकने के कारण कब्ज का रोग हो जाता है, रक्त के सर्कुलेशन में बाधा पड़ने के कारण शिराएं सर फूल उठती हैं, पैर में शोथ होता है, समूची देह फूल जाती है, पेशाब परिमाण में कम होता है, कलेजा धड़कता है, लेकिन इसमें बहुत जल्दी मृत्यु नहीं होती।

ट्राइकस्पिड वाल्व के रोग में भी हार्ट मसल्स कमजोर हो जाती है, तब इस प्रकार के लक्षण प्रकट होते हैं-हृदय-प्रदेश में बहुत तेज दर्द, यह दर्द समूची बांह (बाईं ओर अधिक) में फैलता है, कलेजा धड़कता है, रोगी परिश्रम एकदम नहीं कर सकता, सिर में चक्कर आता है, रोग जितना ही पुराना होता जाता है, श्वास-कष्ट और खांसी भी उतनी ही बढ़ती जाती है, रोगी सो नहीं सकता, इसलिए दमा के रोगी की तरह अकड़न लगाकर बैठा रहता है, पैर फूल जाते हैं, पैरालिसिस (पक्षाघात), एनजाइना-पेक्टोरिस (हुशूल का दर्द), हिमाचुरिया (पेशाब के साथ रक्त निकलना) आदि रोगों की उत्पत्ति हो जाती है। इस रोग में व्यक्ति की शीघ्र मृत्यु हो जाती है, उपचार से कोई लाभ नहीं होता।

उपर्युक्त हाइपरट्रॉफी ऑफ दी हार्ट हृदय-वृद्धि) के जो लक्षण बताए गए हैं, वे सब वाल्व के रोग के कारण उत्पन्न होते हैं, अब यदि वाल्व का रोग न होकर किन्हीं दूसरे कारणों से हाइपरट्रॉफी ऑफ दी हार्ट और हार्ट का डाइलेशन (प्रसारण) हो जाए, तो उसमे जो साधारण लक्षण समूह दिखाई देते हैं, उन्हें हल्की हाइपरट्रॉफी समझें।

नशा करने वाले, बहुत ज्यादा चाय या कॉफी पीने वाले और जो बहुत अधिक इंद्रिय परिचालन करते हैं, जो कुश्तीबाज या रेसलर हैं, जो अपनी सामर्थ्य से अधिक परिश्रम करते हैं, उनके हृदय का जो प्रसारण होता है, वह बताया जा चुका है। इसके अतिरिक्त अधिक उपवास करना, रक्तस्त्राव, सेप्टिक ज्वर, टाइफॉयड (सान्निपातिक विकार), इन्फ्लुएन्जा, थाइसिस (यक्ष्मा), एण्डोकार्बाइटिस (हृदय को ढकने वाली लसदार झिल्ली का प्रदाह), पेरिकाडइटिस आदि कितने ही रोग हार्ट मसल्स की शक्ति घट जाने के कारण से होते हैं, इनसे हार्ट की हाइपरट्रॉफी या डाइलेटेशन हो जाता है। यह वाल्व के रोग के कारण नहीं होता।

साधारण हाइपरट्रॉफी या डाइलेटेशन का लक्षण इस प्रकार है कलेजो धड़कना और इतनी जोर से धड़कना कि रोगी सो नहीं सकता, यकायक नींद खुलकर उठ बैठता है, थोड़ा परिश्रम करने से ही हांफने लगता है। हृदय के ऊपर दर्द होता है, दबाने पर कष्ट होता है, श्वास-प्रश्वास में भी कष्ट होता है। नाड़ी की गति तेज रहती है, मानो दबी हुई है। आंखों के आगे अंधेरा दिखाई देता है, सिर में चक्कर आता है और कान में “भों-भों” आवाजें होती हैं। पथ्य और आनुषंगिक चिकित्सा का विवरण निम्नलिखित है —

रोगी को पौष्टिक और सहज में पचने वाली चीजें खिलानी चाहिए। तंबाकू, जर्दा सब तरह की नशीली चीजों का व्यवहार मना है। जिन्हें हृदय का कोई रोग रहता है, उन्हें ठंडे पानी से स्नान नहीं करना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि रोगी को सर्दी न लग जाए, हमेशा गर्म कपड़े पहनने चाहिए और वह ढीले-ढाले होने चाहिए। हृदय के रोगियों को केवल उतना परिश्रम करना चाहिए, जितने से शरीर क्लांत न हो। सुबह-शाम खुले मैदान में घूमने के सिवा किसी भी प्रकार का परिश्रम (शारीरिक) और मानसिक परिश्रम करना भी मना है, जिसमें दिमाग लड़ाना पड़े या मन में उद्वेग पैदा हो जाए, ऐसी किसी भी तरह की चिंता या विचार मन में न लाना चाहिए।

स्त्रियों को पुरुष-सहवास और पुरुषों के लिए स्त्री-सहवास एकदम निषिद्ध है, विशेषकर द्विकपाट (Mitral) और महाधमनी-कपाट (Aortic Valve) के रोग वालों के लिए तो यह विष समान है। इस तरह के रोगियों को तो बिस्तर से उठने भी नहीं देना चाहिए। मल-मूत्र, खाना-पीना, सब बिस्तर पर ही कराना चाहिए। रोगी का हमेशा पेट साफ रहे, इस बात का ध्यान रखना चाहिए। माइट्रैल-वाल्व के रोग में फुसफुसियाशिरा (Pulmonary Veins) में और फेफड़े में रक्त की अधिकता होने के कारण से मुंह से रक्त निकला करता है, इस तरह से रक्त निकलने पर कॉन्जेशन (रक्ताधिक्य) घट जाता है। इस अवस्था में रोगी को एकदम विश्राम करने देना चाहिए और तुरंत रक्त बंद करने की जल्दबाजी न करनी चाहिए।

साधारण हाइपरट्रॉफी और हार्ट-डाइलेटेशन में भी रोगी को परिश्रम न करने देना चाहिए। पथ्य पर भी विशेष दृष्टि रखनी चाहिए। मांस-मछली और गर्म मसालों का व्यवहार एकदम मना है। आलू, परवल, बैंगन, गूलर, कच्चू, कच्चा केला, साग-सब्जियों इत्यादि की तरकारियों और छेने का पानी, बिदाना व अंगूर का रस आदि अधिक मात्रा में देना चाहिए। चाय, कॉफी, शराब, नशीले पदार्थ का त्याग कर देना चाहिए। रात में जागरण-सब प्रकार के हृदयरोग में मना है। समुद्र की ठंडी वायु ऐसे रोगियों के लिए लाभप्रद है।।

हार्ट का बहुत अधिक डाइलेटेशन हो जाने पर प्रायः हार्ट फेल के लक्षण दिखाई देते हैं। ऐसे समय में औषधि सेवन करने से कोई विशेष लाभ नहीं होता, इस अवस्था में रोगी को केवल विश्राम देना और पुष्टिकारक भोजन पर ही अधिक निर्भर रहना पड़ेगा। मुर्गी के कच्चे अंडे को दूध में फेंट कर नित्य एक बार पिलाना चाहिए। यह सहज में ही पच जाता है और पुष्टिकारक भी है। जब तक हृदय की वृद्धि रहती है, तब तक रोगी को कोई हानि नहीं होती। इस अवस्था में हृदय को सहायता पहुंचाने के लिए नीचे लिखी औषधियां व्यवहार की जा सकती हैं।

आर्निका 30 — अधिक व्यायाम, कुश्ती आदि करने से हृदय की वृद्धि हो जाती है और इस वृद्धि से जिगर से दर्द उठकर बाईं छाती द्वारा होता हुआ बाएं बाजू में नीचे तक जाता है; हाथ की शिराएं (वेंस) सूज जाती हैं, लाल-नीले रंग की हो जाती हैं, हाथ में सुईयां-सी चुभती हैं, तब इससे लाभ होता है।

एकोनाइट 30 — हृदय पर बोझ-सा महसूस करना, हृदय धड़कना, जोर-जोर से धड़कन होना, गले तथा कनपटियों की धमनी में टपकन होना आदि।

कैक्टस 3 (मूल-अर्क) — हृदय ऐसा जकड़ा हुआ मालूम हो मानो लोहे के शिकंजे में कसा पड़ा है और अपना साधारण कार्य करने में असमर्थ है; हृदय पर दबाव और बोझ-सा महसूस होना; हृदय की गति अनियमित होने के कारण गहरी श्वास लेने के लिए विवश होना। छाती के नीचे के हिस्से में दर्दभरी सिकुड़न, ऐसा लगना कि छाती की निचली पसलियां किसी रस्सी से जकड़ी पड़ी हैं, जिससे श्वास लेने में कठिनाई हो रही है। कैक्टस का प्रकतिगत मूल-लक्षण है-जकड़न; किसी भी जगह रोगी जकड़ापन अनुभव करे (छाती में, छाती और पेट के बीच के पर्दे में, जरायु में)। कैक्टस का प्रभाव हृदयरोग को शांत करना है। रोगी कभी-कभी दर्द से चिल्लाता है। विलक्षणता यह है कि हृदयरोग में भिन्न-भिन्न अंगों में, नाड़ी को स्पंदन अनुभव होता है। जैसे पाकाशय में, उदर में, यहां तक कि उंगलियों में नाड़ी का स्पंदन रोगी को अनुभव होता है। दिन के या रात के 11 बजे रोग बढ़ता है (यह रात के 11 बजे की औषध है)। हृदय की नर्वस धड़कन में 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

बेलाडोना 30 — नाड़ी भरी हुई, गले की धमनियों में नाड़ी का विशेष स्पंदन, उन्निद्रता, रात को बेचैनी। नाड़ी के स्पंदन का धक्का सिर में महसूस होता है। श्वास बड़े परिश्रम से लेना पड़ता है। सारे शरीर में स्पंदन, हृदय बहुत बड़ा हुआ लगता है। नाड़ी तेज किंतु कमजोर होती है।

हृदय की वृद्धि की अन्य औषधियां हैं-एमिल नाइट्रेट, डिजि, आर्निका, आरम, ब्रोमियम, आयोडिन, कैलमिया, लैकेसिस, लाइकोपस, मैग्नोलिया, शैण्डि, नैट्रम म्यूर, प्लम्बम, एसेट, पूनस, स्पाइनोसा, रस-टॉक्स, वेरेट्रम विरिङ, कैटिगस आदि।

हृदय वाल्व के रोग में यदि क्षतिपूर्ति न होती हो, अर्थात् जब हृत्पेशी (हृदय-मसल्स) बहुत अधिक परिश्रम कर कमजोर और अकर्मण्य हो जाए, शरीर के रक्त के सर्कुलेशन में बाधा पड़े, रोगी का जीवन संशय में हो, उस समय निम्नलिखित औषधियों का व्यवहार किया जाना चाहिए —

डिजिटेलिस 2x, 3, 6, 30 — यह हृदय के रोग में एक टॉनिक और बलकारक औषधि है। इसके द्वारा जोर का कलेजा धड़कना घट जाता है, हृदय-पेशी की संकोचन-शक्ति बढ़ जाती है और रक्त के दौरान (सर्कुलेशन) की शक्ति की वृद्धि हो जाती है। यदि शरीर के रक्त के सर्कुलेशन में बाधा पड़ती हो (विशेषकर माइट्रैल-वाल्व के रोग में), जब नाड़ी की गति असमान (इरेगुलर) हो, हृदय का शोथ हो जाए, उस समय इससे अधिक लाभ होता है। डॉ. आर्ड का कथन है कि 10 बूंद डिजिटेलिस मूल टिंक्चर, आधा आउंस डिस्टिल्ड-वाटर में मिलाकर (जब तक पेशाब सरलतापूर्वक न होने लगे, तब दो दिनों तक) तीन-तीन घंटों के अंतर से देना लाभप्रद है। हृदय का शोथ यदि रहे, तो 2 दिनों तक प्रयोग करने के बाद क्रमशः औषध की मात्रा घटाकर प्रयोग करनी चाहिए। यदि यह देखने में आए कि 24 घंटों के भीतर ही पेशाब की मात्रा बढ़ गई है, तो समझना होगा कि औषध कि क्रिया होने लगी है। औषध की क्रिया होने और क्षतिपूर्ति ठीक होने पर डिजिटेलिस का प्रयोग एकदम बंद कर देना चाहिए। हृदय में शोथ न हो, तो 2-3 बूंद की मात्रा में 3-3 घंटों के अंतर से व्यवहार करने से ही काम हो जाता है और उसी से हार्ट-मसल्स में शक्ति आ जाती है।

ऐसे अवसर पर आप कह सकते है कि यह व्यवस्था ठीक होम्योपैथिक व्यवस्था नहीं हुई, इसका उत्तर यह है कि नन्-कंपेन्सेटेड अर्थात् जिसमें क्षतिपूर्ति नहीं होती; ऐसी अवस्था में सूक्ष्म मात्रा की किसी औषध से लाभ नहीं होता, केवल समय वृथा नष्ट होता है, पर डिजिटेलिस का कभी भी अधिक दिनों तक व्यवहार न करें। इसके अतिरिक्त इसका प्रयोग करने के बाद रोगी पर हमेशा सतर्क दृष्टि रखें। पेशाब की मात्रा का बढ़ना और नाड़ी का स्पंदने 80-85 से घटते ही औषध देना बंद कर दें। डिजिटेलिस का विष फैलने पर वमन होता है, जी मिचलाता है, नाड़ी असमान चलती है और क्षुद्र हो जाती है, पेशाब की मात्रा विशेषकर माइट्रैल-स्टेनोसिस में बहुत जल्दी घट जाती है। नाइटि स्पिरिट इलसिस के द्वारा डिजिटेलिस की क्रिया बढ़ जाती है।

स्ट्रोफैन्थस 2x — यदि डिजिटेलिस से कोई अधिक लाभ न हो, तो इसे अवश्य देना चाहिए। मदर-टिंक्चर 5 से 10 बूंद की मात्रा में प्रति 4 घंटे के अंतर से प्रयोग करने पर लाभ होगा।

कान्वैलेरिया 6, 2x, 3 — हाइपरट्रॉफी और डाइलेटेशन (हृदय की वृद्धि और हृदय का प्रसारण) के लिए यह भी डिजिटेलिस के समकक्ष औषध है। फुसफुसियाधमनी में यदि रक्त की अधिकता हो जाए, जो श्वास-कष्ट, सोते रहने पर श्वासकृच्छ्रता, मानसिक उद्वेग आदि लक्षण-समूह दिखाई देते हैं, कान्वैलेरिया से सब उपसर्ग शांत हो जाते हैं। शोथ-रोग को दूर करने की यह उत्तम औषधि है। इस रोग के साथ यदि ऐल्बुमिनुरिया (अंडलाल मिला पेशाब) का रोग हो, तो भी इससे लाभ होगा। इसका भूल-अर्क 10-15 बूंद से आरंभ कर क्रमशः औषध का परिमाण बढ़ाते हुए कष्ट की अधिकता के अनुसार दो-तीन घंटों का अंतर देकर सेवन करना चाहिए।

नेरियम ओडोरम 8, 3, 30 — इसके द्वारा बार-बार श्वास-प्रश्वास की वृद्धि घट जाती है। नाड़ी की गति नियमित होती है, पेशाब के परिमाण की वृद्धि होती है। और शोथ, श्वास में कष्ट, कलेजा धड़कना आदि कष्ट कम हो जाते हैं। इसमें आंतों की क्रिया बढ़कर परिपाक शक्ति की उन्नति होती है। हृदय के रोग में तुरंत आराम के लिए मदर-टिंक्चर 5 से 15 बूंद की मात्रा में चीनी, शुगर ऑफ मिल्क या रोटी के साथ मिलाकर दें। औषधि सेवन के आधा घंटे पहले और बाद में कोई भी जलीय-पदार्थ पीने को न दें।

इयोनाइमस 8, 2x, 3x, 6 — इसके द्वारा हृदय की शक्ति और हृदय-पेशी की संकोचन-शक्ति बहुत अधिक बढ़ जाती है। हृदय-रोग के साथ यकृत में रक्त इकट्ठा होना और कामला रहने पर इससे लाभ होता है।

एडोनिस वर्नेलिस (शक्ति आवश्यकतानुसार) — यह डिजिटेलिस और स्ट्रोऊँथस के समकक्ष की औषधि है। इसके द्वारा धमनी की प्रसारणी-शक्ति बढ़ जाती है। एडोनिस अधिक मात्रा में सेवन करने पर हृदय की प्रसारण-शक्ति और कभी-कभी अतिसार, वमन इत्यादि की वृद्धि और धमनी की प्रसारणी-शक्ति बढ़ने के साथ ही साथ पेशाब का वेग भी बढ़ जाता है। एडोनिस के सेवेन से हृदय का श्वास-कष्ट और शोथ तुरंत घट जाता है। इसका मदर-टिंक्चर 5 से 10 बूंद मी मात्रा में प्रति 3-4 घंटे के अंतर से रोज 4-5 बार सेवन करना चाहिए।

कैटिग्स, आइबेरिस, कैलमिया, स्पाइजेलिया, एपोसाईनम आदि भी इस रोग की उत्तम औषधियां हैं। छाती में दर्द और कलेजा धड़कना हृदय-रोग का एक भीषण कष्टदायक उपसर्ग है। इसमें निम्नलिखित उपाय करने पर कष्ट किसी सीमा तक दूर हो जाता है —

हृदय के ऊपर ठंडक पहुंचाने पर छाती का धड़कना और दर्द घटता है। कलेजे के कष्ट के लिए एमिल नाइट्रेट 2 से 4 बूंद रूमाल में डालकर सूंघने को दिया जाए। तो लाभ होता है। एक छोटा बेलस्तर का हृदय के ऊपर प्रयोग करने पर भी लाभ होता है। जिससे पेट में वायु इकट्ठी हो जाए, इस तरह का खान-पान त्याग देना चाहिए।

श्वास में कष्ट, हृदय-रोग का एक भयंकर उपसर्ग है। यदि औषधि-सेवन से लाभ न हो, तो निम्नलिखित उपायों की सहायता ली जा सकती है

बहुत अधिक श्वास के कष्ट के कारण रोगी कातर और बहुत बेचैन हो जाए, तो मार्फिया का प्रयोग कर बहुत से चिकित्सक कष्ट घटाने के लिए बाध्य होते हैं। कान्वैलेरिया के सेवन से कितनी बार श्वास का कष्ट घट जाता है। एमिल नाइट्रेट के सेवन करने और सूंघने से थोड़ा लाभ होता है। ठंडे पानी की मोटी पट्टी यो आइस-बैग का हृदय के ऊपर प्रयोग करने पर भी बहुंत बार थोड़ी देर के लिए लाभ हो जाता है। शोथ भी एक कड़ा उपसर्ग है और चिकित्सक के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है। डिजिटेलिस से शोथ घटता है। एपोसाइनम कैनाबिनम और स्टिगमेटा मेडिस वैधानिक क्रिया के ऊपर अर्थात् कुछ अधिक मात्रा में देने पर लाभ होता है।

इलाटिरिन 2x — शक्ति प्रति 3-4 घंटे के अंतर से एकेक मात्रा सेवन की जाए, तो विशेष लाभ होता है। वमन और मिचली के लिए इन औषधियों की व्यवस्था करेंआर्सेनिक, इपिकाक, ऐसिड हाइड्रो, क्रियोजोट आदि रोगी को बरफ का टुकड़ा चूसने के लिए दें। दूध देने की आवश्यकता हो, तो दूध में थोड़ा-सा चूने का पानी मिलाकर पीने को दें। वाल्व के रोग में लक्षण-भेद से साधारणतः निम्न औषधियों की आवश्यकता होती है

एमिल नाइट्रेट 6x — हृदय के भीतर मानों चिड़िया फड़फड़ा रही हो, उसके साथ ही कैरोटिड-आर्टर (गले की धमनी) तक में भयानक टपक होती है। हृदय की जगहे पर बहुत संकोचन का भाव और रोगी में बेचैनी दिखाई देती है। चेहरे का रंग रक्त की तरह लाल दिखाई देता है, रोगी सदैव ही हवा चाहता है। हृदय के चारों ओर हर समय कष्ट का अनुभव होता है, मानो इसी कारण से कलेजा धड़कता है।

आर्सेनिक 30, 200 — हृदय की क्रिया क्षीण, शोथ, या शोथ का उपक्रम होने पर इसका प्रयोग होता है। हृदय में भयानक दबाव मालूम होना, श्वास लेने में कष्ट, हृदय चारों तरफ मानो कसकर बंधा हुआ है, उसके साथ ही इसका चरित्रगतलक्षण बेचैनी, उद्वेग आदि रहना चाहिए। हृदय कांपता है, थोड़े में ही कलेजा धड़कने लगता है।

ऐसाफिटिडा 6, 30 — हृदय के किसी भी रोग के साथ पेट फूलना, स्त्रियों को हिस्टीरिया का रोग होने पर और भी अधिक लाभकारक है। हृदय खूब कमजोर और जोर-जोर से चलता है, हृदय मानो कांप रहा है। तेजी से कलेजा धड़कना, बेहोशी का भाव, हृदय में सुई गड़ने की तरह तेज दर्द, रोगी सीना कसकर पकड़ लेता है।

कैक्टस 6, 30 — कलेजे में तेज धड़कन जिससे रोगी का मानो दम बंद हुआ जाता है। ठंडा पसीना, हृदय का शोय, हृदय का संकोचन भाव और ऐसा मालूम होता है, मानो कोई हुड़के से हृदय को बंद करता है और फिर खोल देता है। ऐसा मालूम होता है मानो कोई कड़ा पदार्थ हृदय के ऊपर रखा हुआ है, छाती मानो कसकर बंधी हुई है, इसी कारण श्वास लेने में कष्ट होता है।

डिजिटेलिस 3, 6, 30 — क्षीण, असम नाड़ी, हृदय में मानो तूफान आ गया है। ऐसा प्रतीत होना जैसे हृदय की क्रिया अभी बंद हो जाएगी, रोगी जोर से श्वास लेता है। थोड़ा भी हिलने-डुलने से छाती धड़कने लगती है। नाड़ी क्षीण और तेजी से चलती है। शरीर ठंडा और चेहरा बदरंग हो जाता है। हृदय का शोथ, बाईं ओर होने पर कलेजे में धड़कन अधिक होती है।

ग्लोनोइन 6, 30 — हृदय का तेज स्पंदन, उससे ऐसा मालूम होता है मानो हृदय फट जाएगा, कलेजे की धड़कन का तेज आघात उंगली तक फैल जाता है। हृदय का दर्द समूचे शरीर में फैल जाती है। रोगी कांपता है और अचेत-सा हो जाता है।

लाइकोपोडियम 30, 200 — कलेजे में धड़कन, यह रात में बढ़ जाती है, ऐसा प्रतीत होता है मानो हृदय घूम गया है, रोगी बाईं करवट सो नहीं सकता, बाएं हाथ में दर्द और सुन्न हो जाने की तरह मालूम होता है। क्रॉनिक एओर्टाइटिस (महाधमनी-प्रदाह) के रोग में यदि श्वास में बहुत कष्ट हो, तो इस औषधि का व्यवहार किया जाता है। हृदय का बढ़ जाना, हृदय-शूल (एंजाइना पेक्टोरिस) आदि में भी इससे लाभ होता है।

एसिड ऑक्सैलिक 30 — हृदय की एक छोटी-सी जगह पर किसी स्थान में सुई गड़ने की तरह भयानक दर्द जो जरा भी हिलने-डोलने पर बढ़ जाता है। कलेजे की धड़कन दिन की अपेक्षा रात में लेटने पर ज्यादा बढ़ जाती है; अंग-प्रत्यंग, पीठ मानो सुन्न हो जाते हैं। कलेजा बहुत धड़कने के साथ श्वास-कष्ट, हृदय की जगह ऐसा मालूम होता है, मानो चिड़िया फड़फड़ा रही है।

स्पाइजेलिया 6, 30 — हृदय की गति अनियमित, जोर के स्पंदन के साथ हृदय में खोंचा मारने की तरह दर्द जो हाथ तक चला जाता है, बहुत कमजोरी रहती है। कलेजे का धड़कना वस्त्र पर ऊपर से दिखाई देता है।

टैबेकम 6, 30 — हार्ट का डाइलेटेशन, रोगी का कमजोर मालूम होना, नाड़ी क्षीण रहती है और उसका स्पंदन समान नहीं होता, रोगी मुर्दे की तरह हो जाता है, ठंडा पसीना निकलता है, जी मिचलाता है, पेट खाली मालूम होता है, चेहरा बदरंग औरं शरीर ठंडा रहता है। दर्द हृदय के भीतर फैल जाता है और रात में मानों दम-सा अटकने लगता है।

हृदय के प्रसारण एवं हृदय की दुर्बलता के लिए निम्न औषधियों का प्रयोग करना चाहिए

आर्स आयोडाइड 3x — (2 ग्रेन दिन में 3 बार) डॉ० क्लार्क का कथन है कि हृदय-प्रसारण या किसी अन्य कारण से हृदय कमजोर हो, तो यह औषधि ठीक भोजन करने के बाद दिन में 3 बार लेनी चाहिए।

क्रेटेगस (मूल-अर्क) — (5 बूंद 4 बाद प्रतिदिन) डॉ. टायलर ने लिखा है कि एक आयरिश डॉक्टर हृदय की दुर्बलता में इस औषधि को दिया करती थीं, जिनसे उनको नाम प्रचलित हो गया। डॉ० बोरिक का कथन है कि हृदय की दुर्बलता में इससे पूरा लाभ उठाने के लिए देर तक लगातार इसका सेवन करना चाहिए। यह औषधि हृदय के लिए टॉनिक का काम करती हैं।

फेजियोलस 6 — इस औषधि में हृदय के लक्षण मुख्य हैं। हृदय भयानक रूप से धड़कता है, रोगी अनुभव करता है कि मृत्यु समीप आ रही है।

बैराइटी कार्ब 30 — अधिक समय तक रहने वाली तेज धड़कन, सिर में धमक-सी महसूस होती है, हरकत करने से यह और भी बढ़ जाती है, रोगी को कमजोरी महसूस होती है और घबराहट होती है। थोड़ा-सा परिश्रम करने से ही रोगी थकान का अनुभव करता है, उसे निद्रा आने लगती है। बाईं करवट लेटने का विचार आते ही धड़कन जारी हो जाती है। नाड़ियों के सिकुड़ जाने से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। पांवों का पसीना दब जाने से हृदय-रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, जब लाभप्रद है।

मौस्कस 1 — यदि हृदय-रोग के कारण अचेतावस्था-सी आ जाए, तब इससे लाभ होता है।

स्ट्रीफंथस (मूल-अर्क) 6x — हृदय की मांसपेशी क्षीण हो जाए या दुर्बल हो या उसका पूरी तरह काम न रह रहा हो, जिससे दर्द होता हो, तब दें। इसका हृदय पर प्रभाय होता है, हृदय को शक्ति देने के लिए इसका थोड़ी-सी मात्रा में प्रयोग किया जा सकता है। ब्लडप्रेशर बढ़ जाने पर भी यह उपयोगी है।

ऐक्टिया रेसिमोसा 3 — नब्ज छूट गई हो, हृदय में कंपन हो, बाईं तरफ स्तन के नीचे दर्द हो तो हरेक 4 घंटे के अंतर से यह औषधि दें।

स्पाइजेलिया 6, 30 — बाएं हाथ की तरफ तीर चुभने तरह का दर्द हो, तब इस औषधि का प्रयोग करें।

नेजा 6 — हृदय में ऐसा दर्द जो बाएं बाजू की तरफ जाए, हाथ सुन्न हो जाए। धड़कन बढ़ी हो, रोगी गश-सा खा जाए, तब इसे दें।

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