हृदय स्पंदन का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Palpitation ]

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इसे “कलेजा धड़कना” भी कहते हैं। हृदय की जो एक स्वाभाविक गति है और उसके द्वारा बाएं स्तन के नीचे जो एक प्रकार का स्वाभाविक “धुक-धुक” शब्द होता है, वह स्वस्थ अवस्था में हमें बिल्कुल ही अनुभव नहीं होता, किंतु जब वह स्वयं हमारे अनुभव में आने लगता है, हृदय जोर-जोर से और जल्दी-जल्दी स्पंदित होता है, उससे एक प्रकार का कष्ट होता है, उस समय हम उसको “पैल्पिटेशन” (कलेजा धड़कना) कहते हैं। प्रायः साधारण दुर्बल मनुष्यों को भी पैल्पिटेशन होता है। बहुत अधिक मानसिक परिश्रम, अनिद्रा और शोक-दुख आदि को सुनने से भी कलेजे में धड़कन होने लगती है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को यह रोग अधिक होता है। रक्तस्वल्पता (एनीमिया), हरित्पाण्डु-रोग (क्लोरोसिस), मूच्र्छा-वायु (हिस्टीरिया), मासिक रजःस्राव की गड़बड़ी, बहुत अधिक रजःस्राव, गर्भाशय का रोग, संतान को बहुत अधिक समय तक स्तनों का दूध पिलाना, रजःस्राव बंद हो जाना आदि कितने की कारणों से स्त्रियों को यह रोग लग जाता है। हृदय की स्नायविक उत्तेजना और मस्तिष्क के किसी रोग से भी पैल्पिटेशन हो जाता है।

जिनका कलेजा (हृदय) बहुत अधिक धड़कता है, उनको किसी प्रकार का नशा करना, जिसके सेवन से शरीर में थोड़े समय के लिए शक्ति तो आ जाती है, बाद में पहले से भी ज्यादा कमजोरी ला देता है, ऐसे स्टिमुलेंट और चाय-कॉफी, बहुत अधिक पान-सुपारी आदि उत्तेजक पदार्थ का व्यवहार करना उचित नहीं है और यदि इसका उपचार करना हो, तो मूल रोग का ही करना चाहिए। जिन पदार्थों में अधिक श्वेतसार या पालो है, ये सब स्टार्चमय (श्वेतसार) आहार का त्याग कर देना ही उपयुक्त है। बहुत थोड़ा परिश्रम करना, रोगी को बहुत देर तक सोते रहने देना आदि नियमों पर सदैव दृष्टि रखनी चाहिए।

एकोनाइट 3, 30 — ऐसा हृदय-स्पंदन जिसमें हृदय का बल बना रहता है। इसमें यह औषधि लाभ करती है।

नक्सवोमिका 30 — ऐसा हृदय-स्पंदन जिसका कारण अजीर्ण-रोग हो, जो स्पंदन खाने के बाद बढ़ जाए, जिसमें खाने के बाद पेट में वायु उत्पन्न हो जाए, जिसमें कब्ज हो।

पल्सेटिला 30 — स्त्रियों में अजीर्ण-रोग से हृदय-स्पंदन, ऐसा अजीर्ण जिसमें दस्त आते हों और हृदय-स्पंदन हो। हृदय के वातरोग के लिए जिसमें दर्द जल्दी-जल्दी इधर-उधर फिरता है में यह औषधि लाभप्रद है। हृदय में भारीपन, दबाव आदि अनुभव होता है। बड़ी कष्टप्रद धड़कन होती है। दृष्टि धुंधली हो जाती है। रोगी नर्वस होता है, रोता है, गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकता, वायु की इच्छा करता है।

कार्बोवेज 30 — यदि खाना खाने के बाद पेट में वायु भर जाने से हृदय की धड़कन होने लगे, डकार आने से राहत मिले, तब देनी चाहिए।

क्रेटेगस (मूल-अर्क) — यदि धड़कन में हृदय की गति बंद हो जाने की आशंका हो, खतरा जान पड़े, तब 5 बूंद 4-5 बार प्रतिदिन देनी चाहिए।

स्पाइजेलिया 6, 30 — तंबाकू आदि नशीले पदार्थों के सेवन से हृदय में दर्द हो, धड़कन तेज हो, मन दुख हो, स्नायविकता हो, किंतु हृदय की बनावट में कोई भारी क्षति न पहुंची हो, तब इससे लाभ होता है। इस औषधि के विस्तृत-लक्षण पहले भी बताए जा चुके हैं।

कैक्टस 3 (मूल-अर्क) — चलने-फिरने से धड़कन बढ़ती हो; जरा-सी उत्तेजना से हृदय में धीमा-धीमा दर्द होने लगे; ऐसा महसूस हो जैसे कि हृदय किसी शिकंजे में जकड़ा हुआ है, ऐसी चुभन कि चीख निकल जाए, रोगी जोर से रोने लगे, श्वास रुक जाए, कांटा चुभने का-सा हृदय में दर्द हो, तब उपयोगी है।

लिलियम टिग्रिनस 30 — ऐसा अनुभव करना मानो हृदय किसी चिमटे से पकड़ा गया है, ठीक जैसा कैक्टस में होता है। हृदय इतना भरा हुआ अनुभव होता है, जैसे फूट पड़ेगा। सारे शरीर में हृदय का स्पंदन होता है। हृदय-प्रदेश में दर्द, साथ ही यह अनुभव होना कि छाती पर कुछ बोझ पड़ा है। हृदय में ठंड का अनुभव करना। भीड़ में या बंद कमरे में श्वास घुटना, बाएं बाजू में दर्द होना। निद्रा से रोगी ऐसे उठता है मानो हृदय को जोर से जकड़ लिया गया है, यह जकड़न धीरे-धीरे हल्की हो जाती है। ऐसा लगता है, जैसे सारा रक्त हृदय में जा पहुंचा है, रोगी दोहरा हो जाता है, उसे ऐसा लगता है जैसे हृदय पकड़ा और छोड़ा जा रहा है। रोगी गुदा तथा मूत्राशय पर दबाव अनुभव करता है। यदि स्त्री रोगी हो, तो उसे ऐसा अनुभव होता है कि यदि वह जननांगों को अपने हाथों से दबाए न रहे, तो वे सब बाहर निकल पड़ेंगे।

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